अब गौतम गंभीर पर बढ़ा दबाव: क्या भारतीय क्रिकेट में कोच को बीच में हटाना आम बात है?
भारत के हेड कोच गौतम गंभीर टेस्ट क्रिकेट में लगातार हार के बाद चर्चा में हैं। क्या BCCI उन्हें पद से हटाएगी? जानिए भारतीय क्रिकेट में उन दुर्लभ घटनाओं के बारे में, जब कोचों ने अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पद छोड़ा। मदन लाल, कपिल देव और अनिल कुंबले के विवादों की पूरी कहानी यहाँ पढ़ें।
भारत में क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, जुनून है। ऐसे में टीम इंडिया का हेड कोच कौन है और उसका कार्यकाल कैसा चल रहा है, यह राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन जाता है। इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में हैं गौतम गंभीर, जो पिछले एक साल से भारतीय टीम की कमान संभाल रहे हैं। उनके कार्यकाल में टीम ने चैंपियंस ट्रॉफी और एशिया कप जैसे बड़े खिताब जरूर जीते हैं, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में घरेलू मैदान पर लगातार दो क्लीन स्वीप टीम प्रबंधन और BCCI के लिए चिंता की वजह बने हुए हैं। सवाल उठ रहा है—क्या गंभीर पर गाज गिर सकती है?
गंभीर का दौर: खिताब भी, निराशा भी
जूनियर फॉर्मेट में भारत ने गंभीर की कोचिंग में बड़े टूर्नामेंट जीते हैं, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में स्थिति उलट दिखती है। न्यूजीलैंड और साउथ अफ्रीका के खिलाफ घर में हार ने माहौल बदल दिया है। सोशल मीडिया पर गंभीर को हटाने की मांग तेज है, हालांकि बोर्ड ने साफ किया है कि वो जल्दबाजी में फैसले नहीं लेता और दीर्घकालिक प्लानिंग के आधार पर काम करता है।
क्या भारतीय क्रिकेट में कोचों को बीच में हटाया जाता है?
पाकिस्तान क्रिकेट में कोच और कप्तान बदलना आम बात है, लेकिन भारत में यह परंपरा नहीं रही। भारतीय क्रिकेट में स्थिरता का दर्शन हमेशा हावी रहा है—फिर चाहे टीम की सिलेक्शन हो या बोर्ड संचालन। यही वजह है कि गंभीर के मामले में भी किसी तुरंत बदलाव की उम्मीद कम है। फिर भी इतिहास बताता है कि भारत में भी कभी-कभी कोच अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।
मदन लाल विवाद: जब खिलाड़ियों ने ही कर दी बगावत
1996 में कोच बने मदन लाल को महज एक साल के भीतर पद छोड़ना पड़ा। श्रीलंका दौरे के दौरान खिलाड़ियों के खराब प्रदर्शन पर उन्होंने खुलकर मीडिया में नाराजगी जाहिर की। उनके बयान से अजहरुद्दीन, अजय जडेजा और अनिल कुंबले जैसे खिलाड़ी भड़क उठे। ड्रेसिंग रूम में माहौल बिगड़ने के बाद BCCI ने हालात संभालने के लिए मदन लाल को हटाने का फैसला किया।
कपिल देव और मैच फिक्सिंग का तूफान
1999 में कोच बने कपिल देव का कार्यकाल भारतीय क्रिकेट के सबसे उथल-पुथल भरे दौरों में से एक रहा। टीम का प्रदर्शन खराब था ही, ऊपर से 2000 में उन पर मैच फिक्सिंग के गंभीर आरोप लगे। मनोज प्रभाकर के आरोपों ने पूरे देश को झकझोर दिया। दबाव इतना बढ़ा कि कपिल देव को सितंबर 2000 में इस्तीफा देना पड़ा। बाद में जांच में वे निर्दोष पाए गए।
विराट बनाम कुंबले: एक सफल कोच का अचानक अंत
अनिल कुंबले के दौर में टीम इंडिया ने लगातार शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन उनकी सख्त कोचिंग शैली कप्तान विराट कोहली को रास नहीं आई। दोनों के बीच बढ़ती खाई ने टीम मैनेजमेंट को मुश्किल में डाल दिया। चैंपियंस ट्रॉफी 2017 फाइनल हारने के बाद कुंबले ने पद छोड़ दिया। कहा गया कि टीम का "ड्रेसिंग रूम माहौल" उनके खिलाफ था।
तो क्या गंभीर के साथ भी ऐसा हो सकता है?
इतिहास बताता है कि भारतीय कोच आम तौर पर अपने कार्यकाल पूरे करते हैं। बदलाव तभी होता है, जब स्थिति बेहद असहज हो जाए। गंभीर के मामले में अभी बोर्ड का रवैया संतुलित है। BCCI ने फिलहाल उन्हें हटाने के संकेत नहीं दिए हैं, लेकिन लगातार टेस्ट हारें दबाव बढ़ा सकती हैं। आने वाली सीरीजें उनके भविष्य का फैसला तय करेंगी।


Aankhen 




