Bengal Election 2026: बंगाल में मुस्लिम वोट पर सियासी संग्राम, कौन बदलेगा चुनावी खेल?
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक को लेकर सियासी लड़ाई तेज हो गई है। टीएमसी, कांग्रेस, आईएसएफ और ओवैसी के गठबंधन के बीच मुकाबला दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका बेहद निर्णायक मानी जाती है। राज्य की कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी करीब 27 से 30 प्रतिशत के बीच है, जो उन्हें एक मजबूत राजनीतिक ताकत बनाती है। यही वजह है कि हर चुनाव में यह समुदाय सत्ता की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाता है, खासकर मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में।
130 सीटों पर सीधा असर
राज्य की 294 विधानसभा सीटों में से करीब 130 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता सीधे तौर पर जीत-हार का फैसला करते हैं। इनमें से भी लगभग 90 सीटों पर उनकी आबादी 40 प्रतिशत से कहीं अधिक है। ऐसे क्षेत्रों में किसी भी दल के लिए मुस्लिम समर्थन के बिना जीत हासिल करना बेहद मुश्किल माना जाता है।
टीएमसी की पकड़ पर उठने लगे सवाल
लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस इस वोट बैंक पर मजबूत पकड़ बनाए हुए है, लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। समुदाय के एक वर्ग में यह भावना बढ़ रही है कि राजनीतिक दल उन्हें सिर्फ चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं, जबकि उनके विकास और मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
आईएसएफ बना नया दावेदार
इसी असंतोष के बीच इंडियन सेक्युलर फ्रंट एक नए विकल्प के रूप में उभर रहा है। यह दल वामपंथी दलों और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरा है। इस गठबंधन का उद्देश्य टीएमसी के प्रभाव को चुनौती देना है, हालांकि इसके असर को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों में मतभेद है।
ओवैसी-कबीर गठबंधन से नई हलचल
राजनीतिक समीकरणों को और जटिल बनाते हुए हुमायूं कबीर ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ हाथ मिला लिया है। उनकी पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी और एआईएमआईएम मिलकर बड़ी संख्या में सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं, जिससे मुस्लिम वोटों के बंटने की आशंका जताई जा रही है।
वोट बंटवारे से किसे फायदा?
इस नए गठबंधन को लेकर सियासी गलियारों में बहस तेज हो गई है। कई विपक्षी नेता मानते हैं कि इससे धर्मनिरपेक्ष वोटों में बिखराव हो सकता है, जिसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह गठबंधन टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा पाएगा या नहीं।
सभी दलों के निशाने पर गठबंधन
तृणमूल कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों ही इस गठबंधन को लेकर हमलावर हैं। इन दलों का आरोप है कि यह नई राजनीतिक धुरी अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी को फायदा पहुंचाने वाली है। वहीं बीजेपी ने भी इस गठजोड़ पर सवाल उठाए हैं।
टीएमसी से अलग होकर नई राह
हुमायूं कबीर पहले टीएमसी का हिस्सा थे, लेकिन पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते उन्हें बाहर कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने दिसंबर 2025 में अपनी अलग पार्टी बनाई और अब ओवैसी के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतर गए हैं। उनके इस कदम ने राज्य की राजनीति को और अधिक रोचक बना दिया है।
गठबंधन ने दिखाई मजबूती
हाल ही में हुई एक संयुक्त प्रेस वार्ता में असदुद्दीन ओवैसी ने भरोसा जताया कि उनका गठबंधन मजबूती से चुनाव लड़ेगा। वहीं हुमायूं कबीर ने भी साफ कहा कि यह साझेदारी लंबे समय तक बनी रहेगी। ऐसे में साफ है कि पश्चिम बंगाल की सियासत में आने वाले दिनों में कई नए मोड़ देखने को मिल सकते हैं।


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