बंगला विवाद से सियासत गरम, कांग्रेस पर खाली करने का दबाव

कांग्रेस को सरकारी बंगलों को खाली करने के नोटिस से सियासत गरम हो गई है। जानिए क्या है 2006 की नीति, क्या हैं नियम और क्यों बढ़ा यह विवाद।

बंगला विवाद से सियासत गरम, कांग्रेस पर खाली करने का दबाव
प्रतीकात्मक तस्वीर

केंद्र सरकार और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच एक बार फिर टकराव की स्थिति बनती नजर आ रही है। इस बार विवाद की वजह सरकारी बंगलों को खाली करने का नोटिस है, जिसे लेकर राजनीति तेज हो गई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार की ओर से पार्टी को दो अलग-अलग नोटिस भेजे गए हैं, जिनमें तय समय सीमा के भीतर अपने दफ्तर खाली करने को कहा गया है।

दो दफ्तर खाली करने का आदेश
कांग्रेस के मुताबिक, इन नोटिसों में पार्टी को शनिवार, 28 मार्च तक 24 अकबर रोड स्थित मुख्यालय और 5 रायसीना रोड स्थित इंडियन यूथ कांग्रेस के दफ्तर को खाली करने का निर्देश दिया गया है। पार्टी का दावा है कि ये नोटिस 13 मार्च को जारी किए गए थे और अब वह इनके खिलाफ कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है।

2006 नीति का नियम बना विवाद की जड़
दरअसल, केंद्र सरकार की 2006 की नीति के तहत राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को अपना स्थायी कार्यालय बनाने के लिए जमीन दी जाती है। लेकिन शर्त यह होती है कि नई इमारत बनने या जमीन का कब्जा मिलने के तीन साल के भीतर पुराने सरकारी बंगलों को खाली करना अनिवार्य होता है।

नया दफ्तर बनने के बाद भी पुराना कब्जा
रिपोर्ट्स के अनुसार, कांग्रेस को दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर आवंटित जमीन पर ‘इंदिरा भवन’ नाम से नया मुख्यालय तैयार किया गया, जो साल 2025 में बनकर पूरा हुआ। इसके बावजूद पार्टी ने अपने पुराने ठिकानों—अकबर रोड और रायसीना रोड—को खाली नहीं किया, जिससे विवाद खड़ा हो गया।

2013 में ही रद्द हो चुका था आवंटन
सरकारी दस्तावेजों के हवाले से सामने आया है कि कांग्रेस को दिए गए तीन बड़े बंगलों का आवंटन 2013 में ही रद्द कर दिया गया था। हालांकि, पार्टी ने उस समय 26 अकबर रोड स्थित एक परिसर खाली कर दिया था, लेकिन बाकी दो स्थानों पर उसका कब्जा बना रहा।

बीजेपी का उदाहरण भी चर्चा में
इस मामले में भारतीय जनता पार्टी का उदाहरण भी सामने आता है। बीजेपी को भी 2017 में पुराने दफ्तर का आवंटन रद्द होने के बावजूद कुछ वर्षों तक वहां बने रहने दिया गया था। बाद में पार्टी ने दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर नया मुख्यालय बनाने के बाद धीरे-धीरे पुराना परिसर खाली किया।

नियम तोड़ने पर रद्द हो सकता है आवंटन
नीति के अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल को आवंटित जमीन लीज पर दी जाती है और इसके लिए प्रीमियम तथा सालाना किराया देना होता है। यदि कोई पार्टी तय शर्तों का पालन नहीं करती या बकाया राशि नहीं चुकाती, तो उसका आवंटन रद्द किया जा सकता है।

सभी दलों पर समान नियम लागू
सरकारी सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों द्वारा लंबे समय तक बंगलों पर कब्जा बनाए रखना नियमों के खिलाफ रहा है। पहले भी इस मुद्दे को उठाया जा चुका है और सरकार ने साफ किया था कि सभी दलों पर एक समान नियम लागू होंगे।

पहले भी सरकार दे चुकी है संकेत
साल 2022 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी संकेत दिया था कि राजनीतिक दलों से सरकारी बंगलों को खाली कराने की प्रक्रिया जारी है और इसमें सभी पार्टियां शामिल होंगी। अब ताजा नोटिस के बाद यह मुद्दा फिर से राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।