राघव चड्ढा बनाम भगवंत मान: अंदरूनी टकराव से बढ़ी दूरियां, पार्टी में बदली भूमिका
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद राघव चड्ढा और भगवंत मान के बीच बढ़ते मतभेद, पार्टी नेतृत्व से दूरी और राज्यसभा में पद हटने तक की पूरी कहानी पढ़ें।
साल 2022 में पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद राघव चड्ढा का कद काफी बढ़ गया था। राजनीतिक गलियारों में उन्हें अनौपचारिक रूप से बेहद प्रभावशाली नेता माना जाने लगा। यह भी चर्चा रही कि वह सीधे अरविंद केजरीवाल के संपर्क में रहते हैं और कई फैसलों में उनकी अहम भूमिका होती है।
इसी दौरान मुख्यमंत्री भगवंत मान और राघव चड्ढा के बीच मतभेद की खबरें भी सामने आने लगीं। आरोप लगे कि राघव चड्ढा अधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं और कुछ फैसलों में समानांतर भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि दोनों नेताओं ने कभी सार्वजनिक रूप से इन मतभेदों को स्वीकार नहीं किया, लेकिन अंदरखाने तनाव बना रहा।
सूत्रों के मुताबिक, भगवंत मान ने इस मुद्दे पर कई बार अपनी नाराजगी पार्टी नेतृत्व के सामने रखी। इसके बावजूद राघव चड्ढा को शीर्ष नेतृत्व का समर्थन मिलता रहा। हालात तब बदले जब अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान पार्टी के कई नेता विरोध प्रदर्शन में सक्रिय रहे, लेकिन राघव चड्ढा इन कार्यक्रमों से दूरी बनाए रहे।
जहां एक ओर भगवंत मान लगातार पार्टी के समर्थन में धरना-प्रदर्शन करते नजर आए, वहीं राघव की अनुपस्थिति ने सवाल खड़े किए। पार्टी को उम्मीद थी कि वह इस दौरान ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाएंगे।
केजरीवाल के जेल से बाहर आने के बाद राघव चड्ढा को पंजाब की राजनीति से धीरे-धीरे दूर कर दिया गया। इसके साथ ही उनकी केंद्रीय नेतृत्व से भी दूरी बढ़ने लगी। संसद में भी उन्होंने कई ऐसे मुद्दे उठाए जो पार्टी की तय लाइन से अलग माने गए।
राघव चड्ढा ने मिडिल क्लास, टैक्स और गिग वर्कर्स जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया, जिससे पार्टी को लगा कि वह अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी के चलते उन्हें राज्यसभा में पार्टी के डिप्टी लीडर पद से हटा दिया गया।
बताया जाता है कि इस पूरे घटनाक्रम से मुख्यमंत्री भगवंत मान भी नाराज रहे और उन्होंने राघव चड्ढा पर तीखी टिप्पणी करते हुए उन्हें ‘कॉम्प्रोमाइजड’ तक कह दिया।


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