टैरिफ और तेल पर ट्रंप का दबाव: रूस से आयात को लेकर भारत पर अमेरिका की सख्ती
डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के रूस से तेल आयात पर फिर जताई नाराजगी। जानिए नवंबर 2025 के आंकड़े, अमेरिकी टैरिफ, और भारत की ऊर्जा नीति से जुड़ी पूरी रिपोर्ट।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में टैरिफ को लेकर सख्त रुख अपनाया है। इस बार उनके निशाने पर भारत का रूस से तेल आयात है। ट्रंप ने बयान देते हुए कहा कि भारत दरअसल उन्हें खुश करना चाहता था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्होंने एक अच्छा और भला इंसान बताया। ट्रंप के अनुसार, भारत को यह एहसास था कि वह इस मुद्दे पर असंतुष्ट हैं और ऐसे में अमेरिका चाहे तो बहुत तेजी से टैरिफ बढ़ा सकता है।
रूसी तेल आयात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी
इसी बीच आधिकारिक आंकड़े यह संकेत देते हैं कि नवंबर 2025 में भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात बीते छह महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। मात्रा और मूल्य—दोनों ही मामलों में यह बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस दौरान भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 35 प्रतिशत हो गई, जो यह दर्शाता है कि वैश्विक दबावों के बावजूद भारत ने अपने ऊर्जा हितों को प्राथमिकता दी है।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता की धीमी रफ्तार
यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया लगभग ठहरी हुई नजर आ रही है। दोनों देशों के बीच वार्ताएं तो जारी रहीं, लेकिन ठोस नतीजे सामने नहीं आए। इसके बावजूद भारत ने संतुलन साधने की कोशिश करते हुए अमेरिका से तेल की खरीद भी बढ़ाई है, ताकि रणनीतिक साझेदारी पर असर न पड़े।
आंकड़ों में रूस की बढ़ती हिस्सेदारी
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2025 में भारत ने रूस से लगभग 7.7 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया। यह उस महीने देश के कुल तेल आयात का करीब 35 प्रतिशत से अधिक था। यह आंकड़ा नवंबर 2024 की तुलना में लगभग 7 प्रतिशत ज्यादा रहा और मई 2025 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर दर्ज किया गया। मूल्य के लिहाज से देखें तो इस अवधि में रूस से तेल आयात पर भारत ने लगभग 3.7 बिलियन डॉलर खर्च किए।
अमेरिकी टैरिफ और भारत की चिंता
अमेरिका ने अगस्त 2025 में रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर सख्ती दिखाते हुए टैरिफ को 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया था। यह फैसला ऐसे वक्त में लिया गया, जब अगस्त से पहले के आठ महीनों में से सात महीनों में भारत ने सालाना आधार पर रूसी तेल के आयात में कटौती की थी। इसके बावजूद टैरिफ बढ़ाने के फैसले ने भारत के नीति-निर्माताओं को असहज कर दिया।
सरकार के भीतर बढ़ती असंतुष्टि
सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार के भीतर इस बात को लेकर निराशा बढ़ी है कि रूस से तेल आयात घटाने के प्रयासों के बावजूद अमेरिका की ओर से टैरिफ विवाद को सुलझाने में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। इससे यह संकेत मिला कि ऊर्जा नीति में लचीलापन दिखाने के बाद भी भारत को अपेक्षित राहत नहीं मिल पाई।
अमेरिका से तेल खरीद में उछाल
हालांकि, इन निराशाओं के बीच भारत ने पूरी तरह से अमेरिका के हितों की अनदेखी नहीं की। नवंबर 2025 में अमेरिका से भारत का तेल आयात सात महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। इस दौरान भारत ने अमेरिका से करीब 2.8 मिलियन टन तेल खरीदा, जिसकी कीमत लगभग 1.4 बिलियन डॉलर रही।
ऊर्जा कूटनीति में भारत का संतुलन
इस बढ़ोतरी का असर यह हुआ कि नवंबर महीने में भारत के कुल तेल आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 12.6 प्रतिशत हो गई। यह एक महीने पहले केवल 4.2 प्रतिशत थी, जबकि एक साल पहले यह आंकड़ा 5.1 प्रतिशत के आसपास था। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस रणनीति के जरिए रूस और अमेरिका—दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखने की कोशिश कर रहा है।


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