Delhi Riots Case: उमर खालिद–शरजील इमाम को सुप्रीम कोर्ट से झटका, 5 अन्य आरोपियों को सशर्त जमानत

दिल्ली दंगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला। उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत से इनकार, जबकि 5 अन्य आरोपियों को सशर्त राहत। पढ़ें पूरी कानूनी व्याख्या।

Delhi Riots Case: उमर खालिद–शरजील इमाम को सुप्रीम कोर्ट से झटका, 5 अन्य आरोपियों को सशर्त जमानत

दिल्ली दंगों से जुड़े चर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से दोनों की कथित साजिश की भूमिका स्पष्ट झलकती है, इसलिए इस स्तर पर उन्हें राहत नहीं दी जा सकती।

सभी आरोपियों की स्थिति एक जैसी नहीं
हालांकि इसी मामले में लंबे समय से जेल में बंद अन्य पांच आरोपियों को कोर्ट ने 12 सख्त शर्तों के साथ जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि सभी आरोपियों की भूमिका समान नहीं है और हर मामले का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाना जरूरी है।

राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह मामला देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है और ऐसे मामलों में केवल ट्रायल में देरी को जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता। न्यायालय के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना अदालत का कर्तव्य है।

भविष्य में जमानत का रास्ता खुला
कोर्ट ने यह भी कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम को एक साल बाद, यदि ट्रायल पूरा नहीं होता है, तो वे दोबारा जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। इससे पहले उनकी निरंतर हिरासत को आवश्यक माना गया है।

लंबी न्यायिक प्रक्रिया का असर
दिल्ली दंगों के इस केस में उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद करीब पांच साल तीन महीने से तिहाड़ जेल में बंद थे। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में उचित कानूनी आधार अपनाया था, लेकिन लंबे कारावास के सवाल पर पुनर्विचार जरूरी था।

UAPA के प्रावधानों की अहमियत
अदालत ने यूएपीए (UAPA) के प्रावधानों पर विस्तार से टिप्पणी करते हुए कहा कि देश की सुरक्षा से जुड़े कानूनों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अनुसार, इस मामले में मुख्य साजिशकर्ताओं के खिलाफ तथ्यात्मक साक्ष्य मौजूद हैं और अभियोजन पक्ष को लगातार कस्टडी की आवश्यकता है क्योंकि आरोप आतंकी गतिविधियों से जुड़े बताए गए हैं।

आतंकवादी कृत्य की व्यापक परिभाषा
न्यायालय ने यूएपीए की धारा 15 की व्याख्या करते हुए कहा कि आतंकवादी कृत्य सिर्फ हत्या या व्यापक विनाश तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे कृत्य भी इसमें शामिल हैं जो जरूरी सेवाओं को बाधित करें या देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बनें।

जमानत पर न्यायिक दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत का मंच बचाव पक्ष के विस्तृत मूल्यांकन का अवसर नहीं होता। न्यायिक संयम का मतलब जिम्मेदारी से पीछे हटना नहीं है। अदालत को यह देखना होता है कि क्या प्रथम दृष्टया अपराध बनता है और क्या आरोपी की भूमिका का घटना से सीधा संबंध दिखता है।

अलग भूमिका, अलग फैसला
कोर्ट ने कहा कि इस प्रक्रिया से अभियोजन पक्ष का साजिश वाला मामला कमजोर नहीं होता। उमर खालिद और शरजील इमाम की स्थिति अन्य आरोपियों से गुणात्मक रूप से अलग है, इसलिए सभी अपीलों का समान पैमाने पर मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
अंत में अदालत ने अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि ट्रायल से पहले जेल को सजा नहीं माना जा सकता, लेकिन राज्य को लंबी पूर्व-परीक्षण हिरासत को उचित ठहराने का अधिकार है। यूएपीए एक विशेष कानून है, जो जमानत के सामान्य नियमों से अलग शर्तें निर्धारित करता है।