बांग्लादेश में 13वां संसदीय चुनाव संपन्न, 47% से अधिक मतदान; अवामी लीग की गैरमौजूदगी में सत्ता की नई जंग
बांग्लादेश में 13वां संसदीय चुनाव संपन्न हो चुका है। जानिए संसद की कुल सीटें, बहुमत का आंकड़ा, बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के बीच मुकाबला, अवामी लीग की गैरमौजूदगी और 12.7 करोड़ मतदाताओं की भूमिका से जुड़ी पूरी जानकारी।
बांग्लादेश में 13वें संसदीय चुनाव के लिए गुरुवार 12 फरवरी को मतदान शांतिपूर्ण ढंग से पूरा हो गया। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, इस बार 47 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। अगस्त 2024 में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी थी, जिसके बाद देश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। यह चुनाव उसी राजनीतिक उथल-पुथल के बाद हो रहा पहला आम चुनाव है, इसलिए इसके नतीजों को देश की भविष्य की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।
इस चुनाव में मुख्य मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और उसकी पूर्व सहयोगी जमात-ए-इस्लामी के बीच देखने को मिल रहा है। उल्लेखनीय है कि अंतरिम सरकार ने शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को भंग कर दिया था और उसके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई है। अवामी लीग लंबे समय तक देश की प्रमुख राजनीतिक ताकत रही है, ऐसे में उसकी अनुपस्थिति ने चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। कुल 50 राजनीतिक दलों के 1,755 उम्मीदवार और 273 निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में हैं, जिससे मुकाबला बहुकोणीय हो गया है।
350 सीटों वाली संसद में बहुमत का गणित क्या कहता है?
बांग्लादेश की संसद में कुल 350 सीटें हैं। इनमें 300 सीटों पर सीधे जनता मतदान करती है, जबकि 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। ये आरक्षित सीटें चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टियों को उनके प्रदर्शन के अनुपात में आवंटित की जाती हैं। इस बार मतदान 299 सीटों पर हुआ है, इसलिए बहुमत का आंकड़ा 150 सीटों का माना जाएगा। यानी जो भी दल या गठबंधन 150 का आंकड़ा पार करेगा, वही सरकार बनाने की स्थिति में होगा।
12.7 करोड़ मतदाता, पहली बार वोट डालने वालों की अहम भूमिका
बांग्लादेश चुनाव आयोग के अनुसार, देश में लगभग 12.7 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं। इनमें करीब 3.58 प्रतिशत मतदाता ऐसे हैं जो पहली बार मतदान कर रहे हैं। युवाओं और नए मतदाताओं की भागीदारी को इस चुनाव में खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यही वर्ग राजनीतिक बदलाव की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।


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