बिहार में 70,000 करोड़ का घोटाला? कैग रिपोर्ट से मचा सियासी भूचाल, नीतीश सरकार घिरी

Bihar में कैग रिपोर्ट के अनुसार ₹70,877 करोड़ की उपयोगिता रिपोर्ट लंबित है। कांग्रेस और RJD ने नीतीश सरकार पर घोटाले का आरोप लगाया है। जानिए पूरी रिपोर्ट और राजनीतिक प्रतिक्रिया।

बिहार में 70,000 करोड़ का घोटाला? कैग रिपोर्ट से मचा सियासी भूचाल, नीतीश सरकार घिरी
Bihar CM Nitish Kumar

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की 2023-24 रिपोर्ट के अनुसार, बिहार सरकार के विभिन्न विभागों ने ₹70,877 करोड़ की उपयोगिता रिपोर्ट समय पर जमा नहीं की। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा का दावा है कि यह राज्य के सालाना बजट का लगभग एक तिहाई हिस्सा है, जो कि किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा करता है।

उनके मुताबिक, अगर यह सिलसिला नहीं रुका तो अगली बार यह रकम 1.40 लाख करोड़ तक पहुंच सकती है। उन्होंने इस घोटाले की तुलना लालू यादव के शासनकाल के 903 करोड़ के चारा घोटाले से करते हुए कहा कि यह उससे 70 गुना बड़ा है।

किन विभागों में अटका है 70,000 करोड़ का हिसाब? 
कैग रिपोर्ट के अनुसार, बिहार सरकार के कई प्रमुख विभागों ने निर्धारित समय सीमा के भीतर फंड के उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) जमा नहीं किए हैं। सबसे अधिक राशि पंचायती राज विभाग के पास लंबित बताई गई है, जिसकी कुल रकम ₹28,154 करोड़ है।

इसके बाद शिक्षा विभाग का नंबर आता है, जहां ₹12,623 करोड़ की यूसी अब तक जमा नहीं हुई है। शहरी विकास विभाग ने भी ₹11,065 करोड़ की राशि के लिए उपयोगिता रिपोर्ट नहीं सौंपी है।

ग्रामीण विकास विभाग में ₹7,800 करोड़ और कृषि विभाग में ₹2,107 करोड़ की यूसी पेंडिंग है।

इस तरह कुल मिलाकर विभिन्न विभागों में ₹70,877 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का कोई लेखा-जोखा सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिसे विपक्ष संभावित घोटाले का आधार बता रहा है।

विपक्ष का आरोप: 'जनता का पैसा डकार गई सरकार'
राजद नेता तेजस्वी यादव ने भी इस मुद्दे को विधानसभा में जोर-शोर से उठाया और नीतीश सरकार पर जनता के पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगाया। तेजस्वी ने कहा – पहले ये लोग घोटाला करते हैं और फिर जनता को मछली-मटन-मुसलमान में उलझाते हैं।

विपक्ष का दावा है कि सरकार जानबूझकर फंड की उपयोगिता छिपा रही है और यह बिहार की जनता के साथ धोखा है।

सरकार का बचाव: 'ये घोटाला नहीं, प्रक्रिया संबंधी देरी है'
उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और वित्त विभाग के प्रधान सचिव आनंद किशोर ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह एक 'नॉर्मल अकाउंटिंग प्रोसेस' है।

सरकार का दावा-
- 2022-23 में ₹1.09 लाख करोड़ की UC क्लियर की गई
- 2023-24 में और ₹51,750 करोड़ की UC जोड़ी गई
- यह देरी प्रक्रियात्मक है, घोटाले की बात निराधार है

विशेषज्ञों की राय: 'घोटाले का दावा साबित करना मुश्किल'
आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि केवल UC जमा न करना भ्रष्टाचार नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह प्रशासनिक लापरवाही जरूर दर्शाता है। अगर योजनाओं के परिणाम नहीं दिख रहे हैं, तो जरूर जांच होनी चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इसे 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बना सकता है, लेकिन जब तक पुख्ता सबूत सामने नहीं आते, यह सिर्फ राजनीतिक प्रहार ही रहेगा।