हम मुख्यमंत्री नहीं, मान्यता चाहते हैं… — NDA में सीट बंटवारे से पहले जीतन राम मांझी का बड़ा बयान, बोले- 'नाराज़ नहीं, बस सम्मान चाहिए'
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर सियासत तेज है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा — “हम मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते, बस पार्टी को मान्यता लायक सीट चाहिए।” जानिए NDA में सीट शेयरिंग की पूरी अंदरूनी कहानी।
बिहार एनडीए (NDA) में सीट बंटवारे को लेकर जारी माथापच्ची के बीच केंद्रीय मंत्री और हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) के नेता जीतन राम मांझी ने बुधवार को एक ऐसा बयान दिया जिसने सियासी हलचल बढ़ा दी है। मांझी ने कहा कि उनकी पार्टी मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री पद की लालसा नहीं रखती, बल्कि सिर्फ मान्यता प्राप्त दल बनना चाहती है।
मांझी बोले — 'हम मान्यता लायक सीट चाहते हैं'
मांझी ने मीडिया से बातचीत में कहा, हमारे यहां कोई झगड़ा नहीं है। हम बस इतनी सीटें चाहते हैं जिससे हमारी पार्टी विधानसभा में मान्यता प्राप्त हो सके। हमें न तो मुख्यमंत्री बनना है, न उपमुख्यमंत्री — बस हमारी पार्टी का अस्तित्व और सम्मान बना रहे।
उनसे जब यह पूछा गया कि अगर एनडीए ने यह मांग नहीं मानी तो क्या वे गठबंधन से अलग होंगे, तो उन्होंने साफ कहा — अगर हमारी मांग नहीं मानी जाती है तो हम एक भी सीट पर चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन एनडीए में बने रहेंगे।
NDA में सीट शेयरिंग पर अब तक का फॉर्मूला
सूत्रों के मुताबिक, एनडीए के अंदर सीट बंटवारे का जो प्रारंभिक फॉर्मूला तय हुआ है, उसके अनुसार मांझी की पार्टी को सात सीटें दी जा सकती हैं। हालांकि, मांझी reportedly 15 सीटों पर अड़े हुए हैं। वहीं, चिराग पासवान भी अपनी पार्टी को लेकर संतुष्ट नहीं बताए जा रहे, जिस कारण एनडीए की सीट बंटवारे की औपचारिक घोषणा फिलहाल टल गई है।
मांझी का संदेश — 'हम साथ हैं, पर सम्मान चाहिए'
अपने बयान से मांझी ने यह साफ कर दिया है कि वे पाला बदलने या एनडीए से अलग होने के मूड में नहीं हैं। वे बस चाहते हैं कि उनकी पार्टी को सम्मानजनक हिस्सेदारी मिले।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मांझी का यह बयान “दबाव की राजनीति” का हिस्सा है ताकि उन्हें कुछ अतिरिक्त सीटें मिल सकें।
क्यों महत्वपूर्ण है मांझी का रुख?
जीतन राम मांझी बिहार की राजनीति में दलित समाज के बड़े नेता माने जाते हैं। एनडीए के लिए उनका साथ सामाजिक समीकरणों के लिहाज से अहम है। इसलिए सीटों पर अंतिम फैसला लेते समय बीजेपी और जेडीयू दोनों उनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं कर सकते।


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