प्रतापगढ़ का बेल्हा देवी मंदिर: जहां प्रभु श्रीराम ने साधना की, उसी धाम में पहुंचे CM योगी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रतापगढ़ दौरे पर हैं। वह मां बेल्हा देवी मंदिर में पूजा-अर्चना करेंगे और जिले को कई विकास परियोजनाओं की सौगात देंगे। जानिए मां बेल्हा देवी मंदिर का प्राचीन इतिहास और पौराणिक महत्व।

प्रतापगढ़ का बेल्हा देवी मंदिर: जहां प्रभु श्रीराम ने साधना की, उसी धाम में पहुंचे CM योगी
बेल्हा देवी मंदिर

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज प्रतापगढ़ के दौरे पर हैं। इस दौरान वह जिले को कई विकास परियोजनाओं की सौगात देंगे। कार्यक्रम की शुरुआत वह प्रतापगढ़ के प्राचीन और प्रसिद्ध मां बेल्हा देवी मंदिर से करेंगे। यहां सीएम योगी लगभग 10 मिनट तक माता रानी का दर्शन-पूजन करेंगे। इसके बाद वह जीआईसी मैदान में आयोजित जनसभा को संबोधित करेंगे।

मां बेल्हा देवी मंदिर का महत्व
प्रतापगढ़ जिले की पहचान बने मां बेल्हा देवी मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन है। यह मंदिर सई नदी के किनारे स्थित है और यहां रोज़ाना हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त यहां सच्चे मन से प्रार्थना करता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है।

बेल्हा से प्रतापगढ़ तक का नामकरण
मान्यता है कि प्रतापगढ़ का प्राचीन नाम बेला था। इसी वजह से देवी को मां बेल्हा कहा गया और कालांतर में शहर का नाम मां के नाम से जुड़कर प्रतापगढ़ पड़ा। स्थानीय लोगों के अनुसार यदि कोई प्रतापगढ़ आए और मां बेल्हा के मंदिर में दर्शन न करे, तो उसकी यात्रा अधूरी मानी जाती है।

पुराणों से जुड़ा इतिहास
पौराणिक मान्यता के अनुसार जब राजा दक्ष ने यज्ञ कराया था, तब सती वहां बिना बुलाए पहुंच गईं। शिवजी की उपस्थिति न देखकर उन्होंने हवन कुंड में आत्मदाह कर लिया। इसके बाद जब भगवान शिव सती के शरीर को लेकर चल पड़े तो भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसे खंडित कर दिया। जहां-जहां सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई।

प्रतापगढ़ की धरती पर सती का कमर (बेला) भाग गिरा था। तभी यहां मां बेल्हा देवी मंदिर की स्थापना हुई।

भगवान राम से जुड़ी मान्यता
कहा जाता है कि जब भगवान श्रीराम वनवास पर जा रहे थे, तब उन्होंने भी इस मंदिर में आकर मां बेल्हा देवी की पूजा-अर्चना की थी। तभी से यह मान्यता बनी कि मां बेल्हा देवी प्रतापगढ़ की संरक्षक देवी हैं और उनकी आराधना से हर मनोकामना पूरी होती है।

स्थापत्य और निर्माण का इतिहास
मंदिर का निर्माण अवध के राजा प्रताप बहादुर सिंह ने सन 1811 से 1815 के बीच कराया था। मंदिर के गर्भगृह में माता की पूजा पिंडी (पत्थर के कंकड़) के रूप में की जाती है, जबकि मंदिर के ऊपर संगमरमर से बनी माता रानी की भव्य प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर प्रतापगढ़ के आस्था और आर्किटेक्चर दोनों का अद्भुत संगम माना जाता है।