बगराम एयरबेस अफगानिस्तान की संप्रभुता का प्रतीक है... भारत ने दी ट्रंप को कड़ी प्रतिक्रिया
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान को चेतावनी दी है कि बगराम एयरबेस वापस करो, वरना परिणाम भुगतने होंगे। भारत ने ट्रंप की धमकी का विरोध किया और अफगानिस्तान की संप्रभुता का समर्थन किया। पढ़िए कैसे भारत संवाद और विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में अफगानिस्तान को चेतावनी दी कि यदि उसने बगराम एयरबेस (Bagram Airbase) वापस नहीं किया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। ट्रंप ने कहा — “हमने बगराम एयरबेस तालिबान को मुफ्त में दे दिया, अब हमें इसे वापस चाहिए।”
उनके इस बयान ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई हलचल मचा दी है। तालिबान प्रवक्ता ज़बिहुल्लाह मुझाहिद ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा — “हम किसी को भी अपनी जमीन नहीं देंगे।”
भारत ने ट्रंप की धमकी पर जताई नाराजगी
भारत सरकार ने ट्रंप के इस बयान का विरोध करते हुए स्पष्ट कर दिया कि अफगानिस्तान की संप्रभुता और स्थिरता सर्वोपरि है।
मॉस्को में आयोजित सातवें ‘मॉस्को फॉर्मेट सम्मेलन’ (Moscow Format Conference 2025) में भारत ने तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी की उपस्थिति का स्वागत किया और कहा कि अफगानिस्तान पर किसी बाहरी हस्तक्षेप का अधिकार किसी को नहीं है।
भारत ने भले बगराम एयरबेस का नाम नहीं लिया, लेकिन उसके बयान ने साफ संकेत दिया कि नई दिल्ली ट्रंप की आक्रामक नीति का समर्थन नहीं करती।
मॉस्को फॉर्मेट: एशिया की नई कूटनीति का मंच
इस बैठक में अफगानिस्तान, भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान, ताजिकिस्तान, कज़ाखिस्तान समेत कई देशों ने भाग लिया। यह पहली बार था जब तालिबान सरकार के विदेश मंत्री मुत्ताकी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भाग लिया।
भारत ने अफगानिस्तान के प्रति संवाद और विकास आधारित दृष्टिकोण (Dialogue & Development Approach) को तरजीह दी है। नई दिल्ली ने वहां हेल्थ, कृषि, आपदा प्रबंधन और गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सहयोग किया है।
भारत और तालिबान: रिश्तों की नई शुरुआत
भारत ने अब तक तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन उसने मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण कार्यक्रमों के ज़रिए अपनी मौजूदगी बनाए रखी है।
दिलचस्प बात यह है कि 9 से 16 अक्टूबर के बीच तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी भारत दौरे पर आ रहे हैं।
यह उनकी पहली आधिकारिक भारत यात्रा होगी — जिसे विशेषज्ञ क्षेत्रीय शांति और कूटनीतिक संतुलन का ऐतिहासिक कदम बता रहे हैं।
बगराम एयरबेस क्यों है इतना अहम?
काबुल से मात्र 50 किलोमीटर दूर स्थित बगराम एयरबेस सिर्फ एक सैन्य ठिकाना नहीं, बल्कि एक स्ट्रैटेजिक पावर सेंटर (Strategic Power Center) है।
1950 के दशक में सोवियत संघ ने इसे बनाया था और 1980 के अफगान युद्ध में यह सोवियत सेनाओं का मुख्य अड्डा बना। फिर 2001 में 9/11 हमलों के बाद अमेरिकी सेनाओं ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया और बगराम एयरबेस को अपने नियंत्रण में ले लिया।
20 साल तक चले अफगान युद्ध में यही बेस अमेरिकी और नाटो सेनाओं का कमांड हब (Command Hub) रहा। यहां 30,000 से अधिक अमेरिकी सैनिक तैनात थे। 11,000 फीट लंबे रनवे पर C-5 Galaxy जैसे विशाल कार्गो विमान और B-52 Bombers उतर सकते थे।
बेस पर 110 से अधिक विमान शेल्टर, हॉस्पिटल, ईंधन डिपो, जेल और इंटेलिजेंस सेंटर मौजूद थे — जो इसे किसी मिनी-मिलिट्री सिटी जैसा बनाते थे।
भारत की रणनीति: धमकी नहीं, संवाद
जहां ट्रंप “फोर्स-बेस्ड डिप्लोमेसी (Force-based diplomacy)” की राह पर चल रहे हैं, वहीं भारत “डेवलपमेंट-बेस्ड डिप्लोमेसी (Development-based diplomacy)” की मिसाल पेश कर रहा है। नई दिल्ली का मानना है कि स्थिर और शांत अफगानिस्तान ही क्षेत्रीय सुरक्षा की कुंजी है — न कि युद्ध या धमकियां। भारत की इस नीति ने उसे मॉस्को फॉर्मेट में संतुलित मध्यस्थ (Balanced Mediator) के रूप में स्थापित किया है।


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