फुलेरा दूज 2026: जानिए राधा–कृष्ण से जुड़ी फूलों की होली की परंपरा
फुलेरा दूज का पर्व भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के प्रेम को समर्पित है। जानिए फुलेरा दूज की पौराणिक कथा, धार्मिक महत्व और फूलों की होली से जुड़ी परंपरा।
फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला फुलेरा दूज का पर्व भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन का उत्साह खासतौर पर ब्रज क्षेत्र में देखने को मिलता है, जहां मंदिरों और गलियों में भक्ति, प्रेम और उल्लास का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी को समर्पित है और आज पूरे श्रद्धाभाव के साथ मनाया जा रहा है।
वैवाहिक सुख का प्रतीक माना जाता है फुलेरा दूज
फुलेरा दूज के दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की विधिपूर्वक पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन उनकी आराधना करने से वैवाहिक जीवन में सुख, प्रेम और सामंजस्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कई भक्त इस अवसर पर व्रत भी रखते हैं और पूजा के समय व्रत कथा का पाठ करते हैं। माना जाता है कि इस दिन कथा सुनने और सुनाने से भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
राधा रानी के वियोग से उदास हुआ वृंदावन
पौराणिक कथाओं में फुलेरा दूज की एक भावनात्मक कथा का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, एक समय ऐसा आया जब भगवान श्रीकृष्ण लंबे समय तक राधा रानी से मिलने नहीं आए। प्रिय के वियोग में राधा रानी अत्यंत दुखी हो गईं। उनके मन की पीड़ा का असर पूरे वृंदावन पर पड़ने लगा। फूल मुरझा गए, पेड़ सूखने लगे, पक्षियों की चहचहाहट थम गई और वातावरण में गहरी उदासी छा गई।
श्रीकृष्ण ने समझा राधा रानी का दुख
राधा रानी की इस पीड़ा को देखकर गोपियां भी दुखी रहने लगीं। राधा जी ने अन्न-जल तक त्याग दिया और केवल श्रीकृष्ण के दर्शन की प्रतीक्षा में दिन बिताने लगीं। जब श्रीकृष्ण ने वृंदावन की बदली हुई स्थिति देखी, तो वे समझ गए कि यह सब राधा रानी के मन के दुख का परिणाम है। यह जानकर भगवान तुरंत उनसे मिलने वृंदावन की ओर चल पड़े।
श्रीकृष्ण के आगमन से लौटी वृंदावन की रौनक
जैसे ही राधा रानी को यह समाचार मिला कि श्रीकृष्ण वृंदावन आ रहे हैं, उनके चेहरे पर प्रसन्नता लौट आई। श्रीकृष्ण के वृंदावन पहुंचते ही मानो चमत्कार हो गया। सूखे पेड़ फिर से हरे हो गए, मुरझाए फूल खिल उठे और पक्षी मधुर स्वर में गाने लगे। पूरे वृंदावन में आनंद और उल्लास का वातावरण छा गया।
फूलों की होली से जुड़ी है फुलेरा दूज की परंपरा
श्रीकृष्ण को सामने देखकर राधा रानी आनंद से भर उठीं। भगवान ने प्रेमपूर्वक फूल तोड़कर राधा जी पर बरसाए और राधा रानी ने भी उसी स्नेह से श्रीकृष्ण पर फूल बरसाने शुरू कर दिए। देखते ही देखते गोपियां और ग्वाले भी इस आनंद में शामिल हो गए और पूरे वृंदावन में फूलों की होली खेली जाने लगी। इसी आनंदमयी घटना की स्मृति में फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को फुलेरा दूज का पर्व मनाया जाने लगा।


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