भारतीय विज्ञापन जगत के लीजेंड पीयूष पांडे का निधन — 'अब की बार मोदी सरकार' नारे से लिखी थी नई इबारत
भारतीय विज्ञापन जगत के दिग्गज पीयूष पांडे का निधन। ‘अब की बार, मोदी सरकार’ और ‘फेविकोल’ जैसे यादगार विज्ञापन के रचयिता रहे।
भारतीय विज्ञापन जगत को नई पहचान देने वाले पीयूष पांडे (Piyush Pandey) अब हमारे बीच नहीं रहे। गुरुवार को उनके निधन की खबर ने पूरे क्रिएटिव और कॉर्पोरेट वर्ल्ड को झकझोर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मशहूर चुनावी नारा “अब की बार, मोदी सरकार” देने वाले पीयूष पांडे को भारत में विज्ञापन क्रांति का पर्याय माना जाता है।
सुहेल सेठ का भावुक संदेश
जाने-माने कम्युनिकेशन एक्सपर्ट सुहेल सेठ (Suhel Seth) ने एक्स (X) पर लिखा — मेरे सबसे प्यारे दोस्त पीयूष पांडे जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति के निधन से मैं बेहद दुखी और स्तब्ध हूं। भारत ने सिर्फ एक विज्ञापन जगत की हस्ती नहीं, बल्कि एक सच्चे देशभक्त और एक सज्जन व्यक्ति को खोया है। अब जन्नत में भी गूंजेगा – मिले सुर मेरा तुम्हारा।
उनके इस पोस्ट पर हजारों लोगों ने शोक जताते हुए लिखा कि पीयूष पांडे ने विज्ञापन की भाषा को आम आदमी की ज़ुबान में बदला।
40 साल का अद्भुत सफर
पीयूष पांडे ने अपनी पेशेवर यात्रा की शुरुआत ओगिल्वी इंडिया (Ogilvy India) से 1982 में की थी। इससे पहले वे क्रिकेटर, चाय चखने वाले (Tea Taster) और निर्माण मजदूर के रूप में भी काम कर चुके थे।
27 साल की उम्र में जब उन्होंने विज्ञापन जगत में कदम रखा, तब यह क्षेत्र अंग्रेज़ी सोच और विदेशी अप्रोच के अधीन था। लेकिन पीयूष पांडे ने अपनी मातृभाषा की सहजता और भारतीय भावनाओं के रंग से इसे आम जनता के दिलों से जोड़ दिया।
यादगार कैम्पेन जिन्होंने देश का दिल जीता
पीयूष पांडे ने ऐसे विज्ञापन बनाए जो सिर्फ ब्रांड नहीं, लोकसंस्कृति का हिस्सा बन गए —
Fevicol: “यूंही नहीं, Fevicol का जाम है”
Cadbury: “कुछ खास है ज़िंदगी में”
Asian Paints: “हर खुशी में रंग लाए”
Hutch: “You and I, in this beautiful world”
उनके कैंपेन ने यह साबित किया कि विज्ञापन सिर्फ प्रोडक्ट बेचने का माध्यम नहीं, बल्कि भावना और जुड़ाव का सेतु है।
परिवार और शुरुआती जीवन
1955 में जयपुर (Rajasthan) में जन्मे पीयूष पांडे नौ भाई-बहनों में से एक थे — सात बहनें और दो भाई। उनके भाई प्रसून पांडे विज्ञापन निर्देशक हैं, जबकि बहन ईला अरुण हिंदी सिनेमा की प्रसिद्ध गायिका और अभिनेत्री हैं। पिता बैंक में कार्यरत थे और पीयूष ने खुद कई वर्षों तक क्रिकेट खेला था। उनका जीवन हमेशा सादगी, अनुशासन और रचनात्मकता का मिश्रण रहा।
विज्ञापन से परे — एक प्रेरणा
पीयूष पांडे सिर्फ विज्ञापन नहीं बनाते थे, बल्कि “इमोशनल ब्रांडिंग” के ज़रिए लोगों के दिलों में उतरते थे। उन्होंने भारतीय विज्ञापन को ‘कॉपीराइटिंग’ से निकालकर ‘स्टोरीटेलिंग’ में बदला। उनकी सोच थी — “अगर विज्ञापन देखकर किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाए, तो वही असली सफलता है।”
पीयूष पांडे के जाने से भारतीय विज्ञापन इंडस्ट्री ने अपना सबसे बड़ा क्रिएटिव स्तंभ खो दिया। उन्होंने भारत को बताया कि एक अच्छा विचार किसी भाषा, धर्म या वर्ग का मोहताज नहीं होता। आज भी जब कोई ‘फेविकोल’ का विज्ञापन देखता है या ‘कैडबरी’ का स्वाद लेता है, तो उसमें पीयूष पांडे की सोच, शब्द और आत्मा बसती है।


आँखें न्यूज़ 24 




