‘सैयारा’ ने रुलाया जरूर, लेकिन इन 5 कमजोरियों को नजरअंदाज करना मुश्किल है!
‘सैयारा’ एक इमोशनल फिल्म है जिसने दर्शकों को रुला दिया, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसमें कई अहम कमजोरियां भी थीं? आइए जानते हैं Sayara Movie की वो 5 बड़ी खामियां जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बॉलीवुड में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सीधे दर्शकों के दिलों में उतर जाती हैं, और ‘सैयारा’ उन्हीं फिल्मों में से एक मानी जा रही है। मोहित सूरी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में अहान पांडे और अनीत पड्डा की जोड़ी ने इमोशंस की झड़ी लगा दी। थिएटर में दर्शक भावनाओं में डूबे नजर आए, लेकिन क्या वाकई फिल्म हर पहलू से बेहतरीन थी?
भावनाओं की बाढ़ के बीच कुछ खामियां ऐसी भी थीं, जिन्हें अगर सुधारा जाता, तो ‘सैयारा’ एक यादगार फिल्म के साथ-साथ क्लासिक सिनेमा बन सकती थी। आइए नजर डालते हैं फिल्म की उन 5 कमजोरियों पर, जो भावनाओं के ज्वार में बहकर छुप गईं।
1- कहानी में ताजगी की कमी
‘सैयारा’ की स्क्रिप्ट कोई नई बात नहीं कहती। यह वही पुराना ट्रैक है – प्यार, जुदाई, बीमारियाँ, और इमोशनल मोमेंट्स। मोहित सूरी का सिग्नेचर स्टाइल ज़रूर दिखा, लेकिन स्क्रिप्ट के स्तर पर कुछ नया नहीं था। अगर कहानी में थोड़ा नयापन होता, तो इमोशनल असर और गहरा हो सकता था।
2- भावनाओं की अति (Overdose of Emotion)
फिल्म में दुख-दर्द के दृश्य इतने ज़्यादा हैं कि लगता है मानो पूरी दुनिया का दर्द सिर्फ इन किरदारों पर टूट पड़ा है। कई सीन इतने ओवरड्रैमेटिक हो गए कि दर्शकों के लिए उनसे कनेक्ट करना मुश्किल हो गया।
इमोशन तब तक असर करता है जब तक वो रियल लगे – लेकिन जब हर सीन आंसू निकालने के लिए ही बनाया जाए, तो असर उलटा भी हो सकता है।
3- साइड कैरेक्टर्स की उपेक्षा
फिल्म पूरी तरह से मुख्य किरदारों पर केंद्रित रही। बाकी पात्र केवल परछाई बनकर रह गए। सपोर्टिंग कास्ट को मजबूत स्क्रिप्ट और सब-प्लॉट्स दिए जाते तो फिल्म का इमोशनल दायरा और भी बड़ा होता।
4- अल्जाइमर जैसे गंभीर मुद्दे का अधूरा चित्रण
फिल्म में अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी को दिखाया गया, लेकिन उसे बहुत सतही ढंग से टच किया गया। दर्शकों को बीमारी से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में जानकारी नहीं मिलती, जिससे कहानी अधूरी और अस्पष्ट लगती है।
5- धीमी रफ्तार और खिंची हुई कहानी
पहले हाफ में जहां फिल्म इमोशनल ग्रैब करती है, वहीं सेकंड हाफ में इसकी गति बुरी तरह टूट जाती है। कई जगहों पर ऐसा लगता है कि फिल्म को जबरन खींचा जा रहा है, जिससे दर्शक थकान महसूस करते हैं और बार-बार घड़ी की ओर देखते हैं।


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