जब शब्दों से आगे बढ़कर पत्रकार बने रोशनी के दूत, नेत्रदान से जगमगाया मानवता का आकाश

काशी पत्रकार संघ और वाराणसी प्रेस क्लब द्वारा आयोजित नेत्र शिविर में पत्रकारों ने नेत्रदान का संकल्प लिया, जिसने मानवता, सेवा और संवेदना की एक नई मिसाल पेश की।

जब शब्दों से आगे बढ़कर पत्रकार बने रोशनी के दूत, नेत्रदान से जगमगाया मानवता का आकाश

पत्रकार केवल खबरों के वाहक नहीं होते, वे समाज की धड़कनों को महसूस करने वाले वह जीवंत दर्पण होते हैं, जो पीड़ा, संघर्ष और उम्मीद – तीनों को साथ लेकर चलते हैं। भागती-दौड़ती न्यूज़ रूम की दुनिया में रहते हुए भी पत्रकारों का दिल हमेशा आम लोगों की तकलीफों के साथ धड़कता है। यही वजह है कि जब समाज के हित की बात आती है, तो पत्रकारिता सिर्फ लिखने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सेवा के मैदान में भी उतर आती है।

नेत्र शिविर बना मानवता का महाअमृत
इसी मानवीय सोच की सुंदर मिसाल रविवार को तब सामने आई, जब काशी पत्रकार संघ और वाराणसी प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित नेत्र शिविर ने एक साधारण आयोजन को असाधारण बना दिया। यह सिर्फ मेडिकल कैंप नहीं था, बल्कि इंसानियत का वह उजला क्षण था, जिसने साबित कर दिया कि पत्रकारिता का असली अर्थ सूचना देना भर नहीं, बल्कि जरूरतमंद ज़िंदगियों के लिए आशा का दीप जलाना भी है। शिविर में जुटे पत्रकारों ने जब सामूहिक रूप से नेत्रदान का संकल्प लिया, तो वह पल एक भावनात्मक आंदोलन में बदल गया।

मृत्यु के बाद भी जीवन देने का संकल्प
नेत्रदान का फैसला लेना कोई आसान बात नहीं होती। अपने जाने के बाद भी किसी और की दुनिया रोशन कर जाना — यह विचार ही आत्मा को भीतर तक झकझोर देता है। लेकिन जब पत्रकारों ने एक स्वर में यह संकल्प दोहराया, तो ऐसा लगा जैसे अंधेरे के विरुद्ध रोशनी ने खुद मोर्चा संभाल लिया हो। यह सिर्फ एक सामाजिक निर्णय नहीं था, बल्कि संवेदना, साहस और त्याग की त्रिवेणी थी।

आंखों में सेवा की चमक, दिल में मानवता
शिविर में मौजूद हर चेहरे पर एक अलग ही चमक दिखाई दे रही थी — सेवा की, समर्पण की और साझा मानवता की। कोई भावुक होकर कह रहा था कि अगर उसकी आँखें किसी अजनबी की दुनिया में उजाला भर सकें, तो इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है। कोई यह कहता दिखा कि पत्रकारिता का धर्म केवल सच दिखाना नहीं, बल्कि अंधेरे में फंसी ज़िंदगियों तक रोशनी पहुँचाना भी है।

समाज के लिए शब्दों से आगे बढ़कर कर्म की रोशनी
बीएचयू नेत्र विभाग के अध्यक्ष डॉ. आर.पी. मौर्य ने इस शिविर को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इंसानियत की सतत यात्रा का एक सशक्त पड़ाव बताया। उन्होंने कहा कि नेत्रदान वह सेतु है, जो दो अनजानी ज़िंदगियों को जोड़ देता है — एक, जो अंधेरे में है और दूसरा, जो अपना उजाला उसे सौंप देता है। यह संकल्प आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करेगा। संभव है किसी दिन किसी अंधेरी दुनिया में इसी सोच के कारण एक नई सुबह जन्म ले और उस सुबह की रोशनी में पत्रकारों की मानवता की चमक भी शामिल हो।