प्रशांत किशोर का ‘होमग्राउंड’ में फ़्लॉप शो: पदयात्रा भी नहीं बचा पाई जन सुराज की डूबती नैया

बिहार चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर और जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। पदयात्रा और सोशल कैंपेनिंग के बावजूद पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी।

प्रशांत किशोर का ‘होमग्राउंड’ में फ़्लॉप शो: पदयात्रा भी नहीं बचा पाई जन सुराज की डूबती नैया
Prashant Kishor

चुनाव जीतने की बेजोड़ रणनीति के लिए मशहूर प्रशांत किशोर जब पहली बार अपने राज्य बिहार में चुनावी मैदान में उतरे, तो माहौल कुछ ऐसा बनाया गया मानो राजनीतिक इतिहास बदलने वाला हो। महीनों की पदयात्रा, गांव-गांव संपर्क अभियान, नेताओं पर तीखे हमले… सब कुछ था। लेकिन चुनावी नतीजे आए तो जन सुराज का खाता तक नहीं खुला। कई सीटों पर तो उम्मीदवारों की जमानत तक जप्त हो गई।

‘अर्श या फ़र्श’ का दावा, अब बना कड़वी सच्चाई
चुनाव से पहले पीके ने कई बार कहा था कि उनकी पार्टी या तो “अर्श पर रहेगी या फर्श पर।” नतीजों ने साफ कर दिया कि जन सुराज फर्श पर ही अटक गई। उन्होंने जद (यू) को 25 सीटों से कम मिलने का दावा किया था, लेकिन खुद अपनी पार्टी को एक भी सीट दिलाना मुश्किल साबित हुआ।

पदयात्रा और सोशल कैंपेनिंग का भी नहीं पड़ा असर
47 वर्षीय किशोर ने एक साल तक बिहार घूमकर राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश की। भीड़ भी दिखी, मीडिया भी कवरेज देता रहा। फिर भी जब वोट पड़े तो जन सुराज वोटरों को कन्वर्ट करने में नाकाम रही। कई क्षेत्रों में पार्टी को मिलने वाले वोट इतने कम रहे कि पूरे अभियान की मेहनत फीकी पड़ गई।

पिछले अनुमान भी बने उनकी आलोचना का कारण
लोकसभा चुनाव में भाजपा के “300 पार” न जाने के अनुमान में गलती करने के बाद पीके पहले ही विरोधियों के निशाने पर थे। हालांकि वे यह कहते रहे कि भारत जैसे देश में विपक्ष को हमेशा जगह मिलेगी, लेकिन विपक्षी पार्टियां कमजोर हैं। इस बात ने उनकी राजनीतिक समझ जरूर दिखाई, पर इससे जन सुराज की जमीन नहीं बदली।

रणनीति बनाने में माहिर, लेकिन राजनीति में ठोकर
पीके की रणनीतियों से मोदी, ममता, नीतीश, केजरीवाल, जगन, स्टालिन जैसे बड़े नेता लाभान्वित हुए हैं। लेकिन हर अभियान सफल नहीं रहा। बिहार में उनका खुद का राजनीतिक प्रयोग पहली ही बार में बुरी तरह विफल साबित हुआ।

नीतीश कुमार से लेकर ममता बनर्जी तक का सफर
यह पहली बार नहीं है जब पीके ने राजनीति में कदम रखा। 2015 में नीतीश कुमार ने उन्हें मंत्री स्तर का दर्जा देकर अपना सलाहकार बनाया था। बाद में वे जद (यू) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बने, लेकिन सीएए पर विरोध करने के बाद उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया।

इसके बाद उन्होंने “बात बिहार की” अभियान शुरू किया जो ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया। ममता बनर्जी को 2021 में ऐतिहासिक जीत दिलाने के बाद उन्होंने कांग्रेस को भी नया रोडमैप दिया, लेकिन वह भी अमल में नहीं आ सका।

क्या आगे बढ़ पाएगी जन सुराज?
पहला चुनावी डेब्यू विफल रहा है। लेकिन क्या पीके हार मानेंगे? उनकी छवि बताती है कि रणनीति और योजनाओं के मायने वे अच्छे से समझते हैं। अब देखने वाली बात होगी कि जन सुराज को वे फिर से खड़ा कर पाएंगे या बिहार की राजनीति में उनकी यह पारी यहीं रुक जाएगी।