सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की PIL: एमपी-राजस्थान में कफ सिरप से बच्चों की मौत की जांच की मांग ठुकराई

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में ज़हरीले कफ सिरप से बच्चों की मौत के मामले में जांच और औषधि सुरक्षा प्रणाली सुधार की मांग करने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। जानिए कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने क्या आपत्ति जताई।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की PIL: एमपी-राजस्थान में कफ सिरप से बच्चों की मौत की जांच की मांग ठुकराई
Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश और राजस्थान में ज़हरीले कफ सिरप (Toxic Cough Syrup) के सेवन से बच्चों की मौत से जुड़ी जांच और दवा सुरक्षा प्रणाली (Drug Safety System) में सुधार की मांग करने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया।

प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की तीन सदस्यीय पीठ ने इस याचिका को वकील विशाल तिवारी द्वारा दायर किए जाने पर आपत्ति जताई।

कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कुछ लोग सिर्फ अखबारों में खबरें पढ़ते हैं और तुरंत सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं। उन्होंने कहा कि यह मामला राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है और तमिलनाडु तथा मध्य प्रदेश जैसे राज्य पहले से ही गंभीरता से कार्रवाई कर रहे हैं।

मेहता ने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी राज्य की ओर से पेश नहीं हो रहे, लेकिन दवा सुरक्षा और जांच को लेकर राज्यों के पास पर्याप्त कानूनी और प्रशासनिक तंत्र मौजूद हैं।

CJI ने पूछा– अब तक कितनी PIL डाली हैं?
पीठ ने याचिकाकर्ता वकील विशाल तिवारी से पूछा कि उन्होंने अब तक सुप्रीम कोर्ट में कितनी जनहित याचिकाएं दायर की हैं। जब तिवारी ने बताया कि उन्होंने अब तक 8 से 10 PILs दायर की हैं, तो मुख्य न्यायाधीश ने तुरंत कहा – याचिका खारिज की जाती है।

इस टिप्पणी के साथ ही कोर्ट ने यह साफ संकेत दिया कि केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर बार-बार जनहित याचिका दायर करना न्यायिक प्रणाली का दुरुपयोग माना जा सकता है।

क्या है मामला?
हाल के महीनों में मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ जिलों में कथित तौर पर दूषित कफ सिरप पीने से कई बच्चों की मौत की खबरें सामने आई थीं। इसके बाद दवा नियामक विभागों ने संबंधित कंपनियों के खिलाफ जांच शुरू की थी।

जनहित याचिका में मांग की गई थी कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर औषधि सुरक्षा तंत्र (Drug Monitoring System) को मजबूत करे और सभी राज्यों में फार्मा कंपनियों की निगरानी के लिए एक एकीकृत जांच समिति (Central Investigation Mechanism) बनाई जाए।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह विषय पहले से ही राज्यों के नियंत्रण में है और किसी नए हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।