क्या 2025 में 'भूमिहार वोट बैंक' NDA से छिटकेगा? प्रशांत किशोर बन सकते हैं नया भरोसा!
बिहार चुनाव 2025 में भूमिहार वोटरों का झुकाव जन सुराज पार्टी और प्रशांत किशोर की ओर दिख रहा है। क्या गिरिराज, ललन और विजय सिन्हा की राजनीति संकट में है? पढ़िए विस्तार से।
बिहार चुनाव 2025 में भूमिहार वोटरों की भूमिका पर सियासी हलकों में चर्चाएं तेज़ हो गई हैं। क्या एनडीए को इनका समर्थन पहले जैसा मिलेगा या फिर जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (PK) इस वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब हो जाएंगे? गिरिराज सिंह, ललन सिंह और विजय सिन्हा जैसे एनडीए के भूमिहार चेहरों की साख अब गंभीर परीक्षा के दौर से गुजर रही है।
जनसभा में भूमिहारों की उपस्थिति ने बदले समीकरण
हाल ही में बेगूसराय के बखरी में प्रशांत किशोर की जनसभा में उमड़ा भारी जनसैलाब इस ओर इशारा करता है कि अब भूमिहार समुदाय का रुझान बदल सकता है। खास बात यह रही कि बखरी सीट सुरक्षित वर्ग के लिए आरक्षित है और भूमिहार बहुल क्षेत्र भी नहीं है। बावजूद इसके पीके की सभा में भूमिहार युवाओं की भारी भागीदारी ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों की चेतावनी : PK को हल्के में लेना भूल होगी
राजनीतिक जानकार संजीव पांडेय का मानना है कि, "बीते 20 सालों में गिरिराज, ललन और विजय सिन्हा ने भूमिहार समुदाय को सिर्फ झुनझुना थमाया है। उनके पास आज जमीन नहीं है, बच्चे बेरोजगार हैं। ऐसे में प्रशांत किशोर जैसे नेता जो रोजगार और शिक्षा की बात करते हैं, उन पर भरोसा बढ़ना स्वाभाविक है।"
भूमिहारों की नाराज़गी से NDA को लग सकता है तगड़ा झटका
बिहार में भूमिहार जाति की आबादी करीब 2.86% (30-35 लाख वोटर) मानी जाती है, जबकि समुदाय के लोग इसे 5% से अधिक बताते हैं। 243 विधानसभा सीटों में से 30-40 सीटों पर भूमिहारों का निर्णायक प्रभाव है। यदि यह वर्ग जन सुराज की ओर झुका, तो इसका नुकसान सीधे तौर पर एनडीए को उठाना पड़ सकता है।
PK के साथ दिख रहा भूमिहार युवाओं का बड़ा वर्ग
प्रशांत किशोर की रणनीति साफ है – वह शिक्षा, रोजगार और विकास की बात कर रहे हैं, जो वर्तमान भूमिहार पीढ़ी को आकर्षित कर रहा है। उनकी सभाओं में भूमिहार युवाओं की बढ़ती भागीदारी इसका प्रमाण है। सोशल मीडिया पर इसे लेकर लगातार पोस्ट्स वायरल हो रही हैं। कुछ इसे 1990 के दशक की बिहार पीपुल्स पार्टी की लोकप्रियता से जोड़कर देख रहे हैं।
PK का फोकस – ब्राह्मणों और भूमिहारों के दिल में जगह बनाना
जन सुराज के एजेंडे में पारंपरिक जातीय समीकरणों को तोड़कर नए वोटरों को जोड़ने की कोशिश है। सवर्ण समुदाय खासकर ब्राह्मण और भूमिहार वोटरों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति स्पष्ट है। ‘बिहार बदलाव’ का नारा देते हुए PK इन समुदायों में खुद को नया विकल्प साबित करने की जुगत में हैं।
BJP के भूमिहार नेताओं के लिए खतरे की घंटी
यदि भूमिहार वोटर जन सुराज की तरफ खिसकते हैं, तो गिरिराज सिंह, ललन सिंह और विजय सिन्हा की सियासत खतरे में पड़ सकती है। अब भूमिहारों को न तो मटन पार्टी चाहिए, न ही धार्मिक गोलबंदी और न ही बालू-गिट्टी ठेका संस्कृति। वे अब नौकरी और विकास की बात चाहते हैं, और यही प्रशांत किशोर की USP बन सकती है।
जन सुराज का उभार: RJD को मिल सकता है अप्रत्याशित फायदा
यदि जन सुराज एनडीए के सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगाती है, तो RJD को अप्रत्याशित फायदा हो सकता है। खासकर उन 30-40 सीटों पर, जहां 2020 में जीत-हार का अंतर 5000-10000 वोट के भीतर था। ऐसे में तेजस्वी यादव की रणनीति को भी अप्रत्यक्ष समर्थन मिल सकता है।


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