राम विलास पासवान: बिहार के ‘मौसम वैज्ञानिक’ और दलित राजनीति के दमदार चेहरे की कहानी
राम विलास पासवान की जयंती पर पढ़ें उनका सफर– खगड़िया के गांव से दिल्ली की सत्ता तक, एलजेपी, दलित अधिकार और छह प्रधानमंत्रियों के साथ मंत्री पद तक का सफर।
आज भारत की राजनीति में जिन नामों को लोग सामाजिक न्याय और दलित अधिकारों के प्रतीक के तौर पर याद करते हैं, उनमें शुमार है राम विलास पासवान। 5 जुलाई 1946 को बिहार के खगड़िया जिले के छोटे से गांव शहरबन्नी में जन्मे पासवान ने पांच दशकों तक भारतीय राजनीति में अपनी अमिट छाप छोड़ी।
खगड़िया के शहरबन्नी गांव से दिल्ली की सत्ता के गलियारों तक
रामविलास पासवान का जन्म एक दलित परिवार में हुआ। कठिन परिस्थितियों और सामाजिक भेदभाव के बीच उन्होंने शिक्षा हासिल की। उन्होंने कोसी कॉलेज, खगड़िया और पटना विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी की डिग्रियां लीं।
शुरुआत में उनका चयन बिहार पुलिस में डीएसपी (DSP) के रूप में हुआ। लेकिन पुलिस की वर्दी पहनने से ज्यादा उनका सपना समाज की तस्वीर बदलना था। यही जुनून उन्हें राजनीति में ले आया।
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से सफर की शुरुआत
रामविलास पासवान का राजनीतिक सफर 1969 में शुरू हुआ, जब वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर बिहार विधानसभा पहुंचे।
1977 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने इतिहास रच दिया। हाजीपुर सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में उन्होंने 4.25 लाख वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, जो उस वक्त गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। 1989 के चुनाव में उन्होंने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया।
एलजेपी की नींव और दलितों के हक की आवाज
साल 2000 में रामविलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) की स्थापना की। एलजेपी जल्द ही दलित और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए एक मजबूत आवाज बन गई। वे 9 बार लोकसभा सांसद और 2 बार राज्यसभा सांसद रहे।
‘मौसम वैज्ञानिक’ और सत्ता के चाणक्य
रामविलास पासवान को ‘मौसम वैज्ञानिक’ कहा जाता था। वजह थी उनकी अद्भुत राजनीतिक सूझबूझ। वे हर चुनाव से पहले सही गठबंधन का अंदाजा लगा लेते थे और इसी हुनर से वी.पी. सिंह, एच.डी. देवगौड़ा, आई.के. गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी जैसे छह प्रधानमंत्रियों की सरकार में मंत्री बने।
व्यक्तिगत जीवन और विरासत
रामविलास पासवान का व्यक्तिगत जीवन भी चर्चा में रहा। पहला विवाह 1960 में राजकुमारी देवी से हुआ। 1981 में उनसे तलाक के बाद 1983 में उन्होंने रीना शर्मा से शादी की। उनके बेटे चिराग पासवान अब उनकी राजनीतिक विरासत को संभाल रहे हैं।
आखिरी सफर
8 अक्टूबर 2020 को लंबी बीमारी के बाद उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। लेकिन दलितों के हक की लड़ाई और सामाजिक न्याय की उनकी विरासत हमेशा जीवित रहेगी।


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