सिलीगुड़ी में RSS प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा संदेश: ‘हिन्दू संस्कृति विविधताओं में एकता की पहचान’

सिलीगुड़ी में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने युवा सम्मेलन को संबोधित करते हुए हिन्दू संस्कृति, भारत-भक्ति और युवाओं की भूमिका पर बड़ा बयान दिया। शताब्दी वर्ष में संघ के संदेश और राष्ट्र निर्माण की सोच पढ़ें।

सिलीगुड़ी में RSS प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा संदेश: ‘हिन्दू संस्कृति विविधताओं में एकता की पहचान’
Mohan Bhagwat

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत इन दिनों पश्चिम बंगाल प्रवास पर हैं। सिलीगुड़ी में आयोजित युवा सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने राष्ट्र, संस्कृति और सामाजिक एकता को लेकर व्यापक और विचारोत्तेजक वक्तव्य दिया। हजारों युवाओं की मौजूदगी में भागवत ने कहा कि आज जो लोग स्वयं को हिन्दू नहीं मानते, वे भी मूलतः हिन्दू पूर्वजों की ही संतान हैं। पूजा-पद्धति, खान-पान या जीवनशैली अलग हो सकती है, लेकिन भारत की साझा संस्कृति हम सभी को एक सूत्र में बांधती है।

हिन्दू पहचान को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने हिन्दू होने की परिभाषा को सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा। उन्होंने कहा कि जिसके हृदय में भारत-भक्ति नहीं है, वह हिन्दू नहीं हो सकता। हिन्दू संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह विविधताओं का सम्मान करती है और उन्हें अपने भीतर समाहित करती है। यही परंपरा भारत को एक राष्ट्र के रूप में मजबूत बनाती है और समाज को जोड़ने का कार्य करती है।

युवाओं के कंधों पर भविष्य की जिम्मेदारी
युवा सम्मेलन में भागवत ने खासतौर पर युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि भविष्य की जिम्मेदारी चाहे कोई स्वेच्छा से ले या न ले, अंततः वह युवाओं के कंधों पर ही आती है। यदि व्यक्ति केवल अपने और अपने परिवार तक सीमित सोच रखेगा, तो संकट के समय न वह सुरक्षित रह पाएगा और न ही समाज। इतिहास गवाह है कि जब-जब देश पर संकट आया, समाज जाग्रत हुआ और संगठित होकर आगे बढ़ा।

इतिहास से सीख और समाज जागरण का आह्वान
उन्होंने भारत के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि शक, हूण, मुगल, पठान और अंततः अंग्रेजों के काल तक यह क्रम दोहराया गया है। हर दौर में समाज के जागरण ने ही राष्ट्र को बचाया है। समाज में व्याप्त भेदभाव और संकीर्ण स्वार्थों को दूर करने के लिए समय-समय पर समाज सुधार की धाराएं चलीं, जिनका उद्देश्य आत्मबोध को पुनः जाग्रत करना था।

महापुरुषों की प्रेरणा और संघ की विचारधारा
डॉ. मोहन भागवत ने दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के योगदान को याद करते हुए कहा कि इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर समाज सुधार और राष्ट्र निर्माण का कार्य आगे बढ़ा। उन्होंने बताया कि किशोर अवस्था में ही डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में ‘वंदे मातरम्’ आंदोलन का नेतृत्व किया था।

राष्ट्र निर्माण में व्यक्ति निर्माण की भूमिका
भागवत ने कहा कि वीर सावरकर, सुभाषचंद्र बोस और लोकमान्य तिलक जैसे महान नेताओं की तरह डॉ. हेडगेवार का भी यह स्पष्ट मत था कि समाज का निर्माण किए बिना राष्ट्रोद्धार संभव नहीं है। व्यक्ति निर्माण के माध्यम से ही देश की सर्वांगीण उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। यही विचार संघ के कार्यों की मूल आत्मा है।

नेतृत्व की अवधारणा और समाज का दायित्व
रवींद्रनाथ ठाकुर के निबंध ‘स्वदेशी समाज’ का उल्लेख करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि समाज को ऐसे नायकों की आवश्यकता है जो बाहर से ही नहीं, भीतर से भी नेतृत्व कर सकें। नेतृत्व केवल पद से नहीं, बल्कि आचरण और विचार से पैदा होता है। संघ इसी प्रकार के नेतृत्व को समाज के हर क्षेत्र में विकसित करना चाहता है।

संविधान, संघ और राष्ट्र के प्रति आह्वान
अपने संबोधन के अंत में सरसंघचालक ने युवाओं से अपील की कि वे संविधान की संक्षिप्त प्रति अपने घर में रखें और उसका अध्ययन करें। उन्होंने कहा कि संघ में आइए, संघ को परखिए और यदि उचित लगे तो इसके कार्यों से जुड़िए। भारत का प्रत्येक व्यक्ति भारत के लिए जिए, भारत को जाने और भारत को माने—यही संघ की मूल भावना है।

शताब्दी वर्ष में संघ का संकल्प
सिलीगुड़ी का यह युवा सम्मेलन RSS की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित राष्ट्रीय कार्यक्रमों की श्रृंखला का हिस्सा है। शताब्दी वर्ष में प्रवेश के साथ संघ ने संस्थापक द्वारा प्रतिपादित आदर्शों और मूल्यों के आधार पर राष्ट्र निर्माण और सामाजिक विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को एक बार फिर दृढ़ता से दोहराया है। सम्मेलन की सफलता के लिए सैकड़ों स्वयंसेवक कई दिनों से तैयारियों में जुटे थे और सुबह से ही 15 से 35 वर्ष आयु वर्ग के हजारों युवक-युवतियां कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने लगे थे।